सूखते ही लाल जो होने लगे
हमें क्या पता था कि बनती चट्टानों से टूटकर मिट्टी
हम तो पत्थर, थे पिघलने लगे...
जब भी देखा तो फूल ही लगे
मगर हाथ जब भी बढाया कांटे ही चुभे
दर्द चुभने का नहीं था हमें
लहू तो तब बहा जब घाव फूलों ने दिए...
हर बात पर मुस्कुरा कर आगे चले जाना आदत थी
मगर उनके मिलने पर मुड़ने लगे दर्द पर भी
आँखों को माना करते थे कि न देखें
मगर ज़हन तो उन्ही के पास था न उनके होने पर भी...
राहें धुंध से भरी थी मेरी
मगर मंजिलें नज़र में थीं
थक कर चूर होने किचाहत थी मेरी
मगर हर कदम एक नयी उम्मीद राह देती थी...
गहरी थी गम की नज़रें मुझ पर
मगर मैं भी क्म न था
अपनी हर हर पर खुशियाँ मनाता गया
मुझसे जलने वालों का कुफ्र कुछ कमतर ही लगा...
चिराग के बुझ जाने के बाद का सवेरा थे वो सारे
मैंने खुद को आग बना लिया
वो सारे थे अगर जमीन पर बिखरे सितारे
मैंने खुद शामियाने बिखरी जारी बना लिया...
शामिल नहीं हम उनकी महफ़िल में तो क्या
हमारे खयालों में तो उनका आना जाना है
हाँ माना की वो जन्नत के बाशिंदे हैं
मगर हमारे ख्वाबों में आज भी उनका ज़मीं पर आना है...
उनसे हर रिश्ता मेरा टूटा है ये तो मानते है हम भी
मगर तार अब भी जुड़े हैं धडकनों के उनसे
सांसें नहीं दर्मियां ये जानते हैं हम भी
मगर मेरे आंसुओं का रिश्ता अज भी है उनसे...
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